अंत

 



में बहना चाहता हूँ शायद नदियों की तरह
जंगल पहाड़ खेत खलयान शहरो से होते हुए
ओर आखिर मे पहुँचना होगा सागर में
और ये पहुँचना मेरी मंजिल नही अंत होगा

जैसे जब कोई परिंदा आसमान में उड़ता ह्रै
तो पीछे अपने उड़ने का निशान नही छोड़ता




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